Tuesday , 14 April 2026
Home Uncategorized Demise: अयोध्या श्रीराम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास का निधन
Uncategorized

Demise: अयोध्या श्रीराम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास का निधन

अयोध्या श्रीराम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र

बाबरी विध्वंस के समय गोद में लेकर भागे थे रामलला को

Demise: अयोध्या(ई-न्यूज)। अयोध्या भले ही भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हो गया है और उसमें रामलला पधार चुके हैं लेकिन बात उस समय की है जब बाबरी विध्वंस हो रहा था तो श्री रामलला की प्रतिमा को गोद लेकर भागने वाले पुजारी सत्येंद्र दास ही थे। अयोध्या मंदिर के मुख्य पुजारी का दायित्व भी वह निभा रहे थे। 80 साल की उम्र में आज बुधवार को उनका निधन हो गया। 3 फरवरी को ब्रेन हेमरेज के बाद उनको अयोध्या से लखनऊ रेफर किया गया था।


अंतिम दर्शन को रखी जाएगी पार्थिवदेह


आचार्य सत्येंद्र दास का पार्थिव शरीर अयोध्या लाया जाएगा। उनके आश्रम सत्य धाम गोपाल मंदिर में अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। सत्येंद्र दास 32 साल से रामजन्मभूमि में बतौर मुख्य पुजारी सेवा दे रहे थे। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी विध्वंस के समय वे रामलला को गोद में लेकर भागे थे।


अयोध्या में बीता जीवन


सत्येंद्र दास का जन्म संतकबीरनगर जिले में 20 मई, 1945 में हुआ था। यह जिला अयोध्या से 98 किमी दूर है। वे बचपन से ही भक्ति भाव में रहते थे। उनके पिता अक्सर अयोध्या जाया करते थे, वह भी अपने पिता के साथ अयोध्या घूमने जाते थे। अयोध्या में उनके पिता अभिराम दास जी के आश्रम में आते थे। सत्येंद्र दास भी अभिराम जी के आश्रम में आने लगे थे। अभिराम दास वही थे, जिन्होंने राम जन्मभूमि में 22-23 दिसंबर 1949 में गर्भगृह में राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता जी की मूर्तियों के प्रकट होने का दावा किया था। इन्हीं मूर्तियों के आधार पर आगे की लड़ाई लड़ी गई। मूर्तियों के प्रकट होने के दावे और अभिराम दास जी की रामलला के प्रति सेवा देखकर सत्येंद्र दास बहुत प्रभावित हुए। उन्हीं के आश्रम में रहने के लिए उन्होंने संन्यास लेने का फैसला किया। सत्येंद्र दास ने 1958 में घर छोड़ दिया। उनके परिवार में दो भाई और एक बहन थीं। बहन का निधन हो चुका है।


संस्कृत से आचार्य किया, फिर टीचर बने


अभिराम दास के आश्रम में पहुंचने के बाद सत्येंद्र दास ने संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी। गुरुकुल पद्धति से पढऩे के बाद 12 वीं तक की संस्कृत से ही पढ़ाई पूरी की। संस्कृत से आचार्य किया। पूजा-पाठ करते-करते अयोध्या में नौकरी की तलाश शुरू कर दी। ये तलाश पूरी 1976 में हुई। उन्हें अयोध्या के संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण विभाग में सहायक टीचर की नौकरी मिल गई। उस समय 75 रुपए तनख्वाह मिलने लगी। इस दौरान वे राम जन्मभूमि भी आया जाया करते थे। इस तरह पूजा का काम भी चल रहा था और स्कूल का भी। तब उन्हें बतौर पुजारी सिर्फ 100 रुपए तनख्वाह मिलती थी। जब 30 जून 2007 को वे अध्यापक के पद से रिटायर हए, तो उन्हें फिर यहां 13 हजार रुपए तनख्वाह मिलने लगी। सहायक पुजारियों को 8000 रुपए तनख्वाह मिल रही थी। साभार…

source internet…  साभार…. 

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Campaign: एचपीवी वैक्सीन में बैतूल 13 वें नंबर पर

राजगढ़ में 100 प्रतिशत, प्रदेश में आया अव्वल Campaign: बैतूल। सर्वाइकल कैंसर...

Helpline Issued: महंगी किताबों पर स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए हेल्पलाइन जारी

नए शिक्षा सत्र में अभिभावकों को राहत, शिकायत पर तुरंत होगी कार्रवाई...

Arrested: पानी की मोटर चोरी करने वाले दो आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने चोरों से 1.20 लाख का मशरूका किया बरामद Arrested: आमला।...

Arrested: पानी की मोटर चोरी करने वाले दो आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने चोरों से 1.20 लाख का मशरूका किया बरामद Arrested: आमला।...