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Big decision: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: किरायेदार कभी नहीं बन सकता मकान का मालिक

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: किरायेदार

सात दशक पुराना विवाद निपटा

Big decision: नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारी से जुड़े एक ऐतिहासिक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कोई भी किरायेदार, जिसने किसी मकान मालिक से किरायानामा (Rent Deed) के तहत मकान या दुकान किराए पर ली है, वह कभी भी उस संपत्ति पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि किराया चुकाने का लंबा इतिहास भी स्वामित्व का अधिकार नहीं देता।

यह फैसला न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने सात दशक पुराने विवाद को निपटाते हुए सुनाया।


🏠 मामला क्या था

मामला रामजी दास नामक व्यक्ति और उनके किरायेदारों के उत्तराधिकारियों के बीच चल रहा था। रामजी दास की बहू (वादी) ने अपने ससुर की 12 मई 1999 की वसीयत के आधार पर विवादित दुकान पर स्वामित्व का दावा किया और अपने मिठाई व नमकीन व्यवसाय के विस्तार के लिए दुकान खाली कराने की मांग की।

किरायेदारों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि रामजी दास मालिक नहीं थे और वसीयत फर्जी है। उनका कहना था कि संपत्ति पर हक रामजी दास के चाचा सुआ लाल का था।


⚖️ अदालतों के फैसले और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट—तीनों ने वादी की याचिका खारिज कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों के निष्कर्ष भ्रामक और साक्ष्यों के विपरीत हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1953 की रिलिंक्विशमेंट डीड (त्यागपत्र) को निर्णायक माना, जिसमें सुआ लाल ने संपत्ति का अधिकार रामजी दास को सौंपा था। अदालत ने कहा कि किरायेदारों ने 1953 से लेकर रामजी दास और उनके पुत्रों को किराया दिया, जिससे यह साबित होता है कि रामजी दास ही वैध मालिक थे।


🧾 वसीयत की वैधता और वास्तविक आवश्यकता

कोर्ट ने कहा कि 2018 में जारी प्रोबेट ऑर्डर (वसीयत की वैधता प्रमाणित करने वाला आदेश) को हाईकोर्ट ने गलत तरीके से नजरअंदाज किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा — “सिर्फ इसलिए वसीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता कि उसमें पत्नी का उल्लेख नहीं है। एक बार वसीयत प्रमाणित हो जाए, तो उससे प्राप्त स्वामित्व कानूनी रूप से मान्य होता है।”

अदालत ने यह भी माना कि वादी परिवार पहले से पास की दुकान में मिठाई और नमकीन का व्यवसाय चला रहा था, और विवादित दुकान की आवश्यकता व्यवसाय विस्तार के लिए सच्ची (bona fide) थी।


🕰️ सुप्रीम कोर्ट का आदेश

  • किरायेदारों को छह महीने में दुकान खाली करनी होगी।
  • दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र देकर यह आश्वासन देना होगा कि वे एक महीने में बकाया किराया चुका देंगे और छह महीने में दुकान खाली करेंगे।
  • ऐसा न करने पर मकान मालिक को summary eviction (त्वरित निष्कासन) का अधिकार होगा।
  • जनवरी 2000 से बकाया किराया वसूलने का भी निर्देश दिया गया।

📌 कानूनी असर

यह फैसला देशभर में चल रहे हजारों किरायेदारी विवादों पर असर डालेगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किरायेदारी का संबंध कभी भी स्वामित्व का हक नहीं बन सकता, चाहे किरायेदार ने वर्षों तक किराया ही क्यों न चुकाया हो।

साभार… 

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