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Archaeology: पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की मरम्मत पूरी, जल्द होगी रत्नों की गिनती

पुरी श्री जगन्नाथ मंदिर के रत्न भंडार की

Archaeology: पुरी | भारतीय पुरातत्व संस्थान (ASI) ने पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर के बहुचर्चित रत्न भंडार की मरम्मत और जीर्णोद्धार कार्य सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। अब इस ऐतिहासिक खजाने में रखे हीरे-जवाहरात और आभूषणों की गिनती और सूचीबद्ध करने का कार्य राज्य सरकार की अनुमति के बाद किया जाएगा। सोमवार को मंदिर के मुख्य प्रशासक अरबिंद पधी और ASI के प्रमुख डीबी गरनायक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह जानकारी साझा की।


🔧 95 दिनों में हुआ जीर्णोद्धार

मंदिर के आंतरिक कक्ष, जो भगवान जगन्नाथ के सबसे कीमती रत्नों और आभूषणों को रखने के लिए सुरक्षित स्थान है, को 46 वर्षों के बाद पहली बार खोला गया था। मरम्मत कार्य में कुल 95 दिन लगे और इसमें 80 विशेषज्ञों की टीम ने भाग लिया। इस दौरान भगवान के खजाने को सुरक्षित रखने के विशेष प्रबंध किए गए।


💎 1978 की सूची: 128 किलो सोना और 200 किलो चांदी

भगवान जगन्नाथ मंदिर में रखे रत्नों की आखिरी सूची 1978 में तैयार की गई थी, जिसके अनुसार रत्न भंडार में:

  • 128 किलोग्राम सोना
  • 200 किलोग्राम से अधिक चांदी
    मौजूद है।
    कुछ आभूषण ऐसे भी हैं, जिन पर केवल सोने की परत चढ़ी हुई है और उनका सही वजन दर्ज नहीं है।

पिछले वर्ष जुलाई में जब रत्न भंडार खोला गया था, तब वहां रखे आभूषणों को दो चरणों में अस्थायी स्ट्रांग रूम में स्थानांतरित किया गया था।


🛠️ रत्न भंडार में संरचनात्मक सुधार

ASI प्रमुख डीबी गरनायक ने बताया कि:

  • 520 क्षतिग्रस्त पत्थर ब्लॉक्स को बदला गया।
  • 15 बीमों को स्टेनलेस स्टील बीमों से प्रतिस्थापित किया गया।
  • फर्श को अब ग्रेनाइट पत्थरों से मजबूत किया गया है।
  • जीर्णोद्धार पारंपरिक ‘सूखी चिनाई’ (dry masonry) तकनीक से किया गया है।

🕉️ नीलाद्रि बिजे से पहले काम पूरा

मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह कार्य 8 जुलाई को नीलाद्रि बिजे अनुष्ठान से पहले पूरा कर लिया गया।
नीलाद्रि बिजे वह पावन दिन होता है जब भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र रथ यात्रा के बाद गर्भगृह में वापस लौटते हैं, और यह उत्सव का समापन दर्शाता है।


🔍 आगे क्या?

मुख्य प्रशासक पधी ने स्पष्ट किया कि अब जल्द ही रत्नों को फिर से रत्न भंडार में सुरक्षित रूप से स्थापित किया जाएगा।
नई सूची और गिनती राज्य सरकार की अनुमति के बाद ही की जाएगी, ताकि पारदर्शिता और ऐतिहासिक महत्व को बनाए रखा जा सके।

साभार.. 

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