नवग्रह के साथ उनकी पत्नियों की प्रतिमाएं, 108 स्तंभों पर आधारित अनूठी स्थापत्य रचना
Navagraha Temple: ग्वालियर/डबरा। मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले के डबरा में एशिया का सबसे बड़ा और अद्भुत नवग्रह मंदिर आकार ले चुका है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां नवग्रह केवल अकेले नहीं, बल्कि अपनी-अपनी पत्नियों के साथ विराजमान हैं। यह मंदिर 12 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ है और पूरी तरह सनातन परंपरा, वास्तु शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र के गहन अध्ययन पर आधारित है।
108 स्तंभों पर आधारित ब्रह्मांडीय संरचना
मंदिर का निर्माण 108 स्तंभों पर किया गया है। हिंदू धर्म में 108 का विशेष महत्व माना जाता है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मांड में 27 नक्षत्र हैं और प्रत्येक नक्षत्र की चार दिशाएं होती हैं। 27 गुणा 4 करने पर 108 की संख्या प्राप्त होती है, जिसे संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है।
108 को हर्षद संख्या भी कहा जाता है, जिसका अर्थ ‘महान आनंद’ होता है। मान्यता है कि हृदय चक्र का निर्माण भी 108 ऊर्जा रेखाओं के प्रतिच्छेदन से होता है। इसी आध्यात्मिक सोच के साथ मंदिर की संरचना तैयार की गई है।
तीन तलों पर स्थापित हैं अलग-अलग ग्रह मंदिर
मंदिर परिसर को तीन तलों में विभाजित किया गया है।
- भू-तल पर आठ ग्रहों की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।
- प्रथम तल पर मुख्य ग्रह सूर्य देव की अष्टधातु प्रतिमा उनकी दो पत्नियों के साथ स्थापित है। सूर्य मंदिर के प्रवेश द्वार पर सात सफेद संगमरमर के अश्व बनाए गए हैं।
- द्वितीय तल पर ग्रहों के वाहनों के अधिष्ठाता देवताओं को विराजमान किया गया है।
इस तरह से सभी ग्रहों और उनके वाहनों को इस प्रकार स्थान दिया गया है कि किसी ग्रह की दृष्टि दूसरे ग्रह पर न पड़े। साथ ही ग्रहों की प्रतिमाएं उनके वास्तविक रंगों के अनुरूप बनाई गई हैं।
सूर्य के तेज को संतुलित करने जल परिक्रमा
मंदिर के चारों ओर उतने ही क्षेत्रफल में विशाल सरोवर का निर्माण किया गया है, जितना मंदिर का क्षेत्रफल है। सरोवर का जल मंदिर की परिक्रमा करते हुए पुनः उसी में लौटता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार सूर्य की ऊर्जा को संतुलित करने के लिए जल का होना आवश्यक माना गया है। इसी तर्क के आधार पर सूर्य मंदिर के चारों ओर जल संरचना विकसित की गई है, जिससे सूर्य के तेज का संतुलन बना रहे।
द्रविड़ स्थापत्य शैली में निर्मित भव्य मंदिर
मंदिर के वास्तुकार और डिजाइन इंजीनियर अनिल शर्मा के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण द्रविड़ स्थापत्य शैली में किया गया है। इस शैली की विशेषता वर्गाकार गर्भगृह, पिरामिडनुमा शिखर, विशाल प्रांगण, जलकुंड, गोपुरम द्वार, दीप स्तंभ और ध्वज स्तंभ होती है। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों की तर्ज पर बनाए गए इस परिसर में पुष्करिणी (जलाशय) और कल्याणी की भी व्यवस्था की गई है।
पर्यटन के नक्शे पर उभरा डबरा
नवग्रह मंदिर के निर्माण से डबरा अब धार्मिक पर्यटन के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्वालियर से ओरछा जाने वाले श्रद्धालु अब डबरा के नवग्रह मंदिर, दतिया के पीतांबरा पीठ और फिर ओरछा की यात्रा कर सकेंगे। मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा अगले महीने 11 से 20 फरवरी के बीच प्रस्तावित है, जिसके बाद यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में आवाजाही की उम्मीद है।
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