AI और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल से फेक न्यूज, डीपफेक और मानसिक स्वास्थ्य पर खतरा
Digital: टेक्नोलॉजी डेस्क। आज पढ़ाई और जानकारी के नाम पर बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन और AI टूल्स आसानी से पहुंच चुके हैं। ऐसे में माता-पिता की सबसे बड़ी चिंता यह है कि बच्चे गलत, आपत्तिजनक या संवेदनशील कंटेंट के संपर्क में न आ जाएं। हालिया सर्वे में Salesforce ने बताया है कि भारत में 73% लोग AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनमें 65% हिस्सेदारी Gen-Z की है। वहीं सोशल मीडिया और AI चैटबॉट्स के बढ़ते उपयोग के साथ फेक न्यूज, डीपफेक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम भी तेजी से सामने आ रहे हैं। हाल ही में Grok जैसे प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं।
एक्सपर्ट्स की सलाह: बच्चों के लिए AI को बनाएं सुरक्षित
डिजिटल एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को तकनीक से दूर रखने की बजाय सही गाइडेंस और कंट्रोल ज्यादा जरूरी है। इसके लिए कुछ आसान लेकिन प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं।
फोन मॉनिटरिंग है जरूरी
माता-पिता को बच्चों की सिर्फ स्क्रीन नहीं, बल्कि उनकी डिजिटल एक्टिविटी पर भी नजर रखनी चाहिए।
Watcher जैसे ऐप्स के जरिए
- नोटिफिकेशन
- लोकेशन
- ऐप इस्तेमाल का समय
आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।
AI और सोशल मीडिया टूल्स में पेरेंटल कंट्रोल ऑन करें
- ChatGPT: फैमिली अकाउंट के जरिए बच्चों की चैट लिमिट और कंटेंट कंट्रोल किया जा सकता है।
- Google Gemini: Google Family Link से एक्सेस और ऐप परमिशन मैनेज होती है।
- YouTube: फैमिली लिंक और फैमिली सेंटर से सर्च, रिकमेंडेशन और स्क्रीन टाइम सेट करें।
- Instagram: ‘Supervision for Teens’ मोड से AI चैट, कीवर्ड फिल्टर और स्क्रीन टाइम कंट्रोल संभव है।
अतिरिक्त सुरक्षा के लिए पैरेंटल कंट्रोल AI ऐप्स
Net Nanny, Canopy और Qustodio जैसे ऐप्स AI की मदद से
- सेंसिटिव कंटेंट ब्लॉक करते हैं
- बच्चों की ऑनलाइन एक्टिविटी की रिपोर्ट पेरेंट्स को भेजते हैं
एक्सपर्ट्स की सलाह
तकनीक से बच्चों को डराने की बजाय उन्हें डिजिटल समझ, सीमाएं और जिम्मेदारी सिखाना जरूरी है। सही निगरानी और संवाद से AI बच्चों के लिए खतरा नहीं, बल्कि सीखने का सुरक्षित माध्यम बन सकता है।
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