Maha Shivaratri: भोपाल। पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी और चतुर्दशी के संधिकाल में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 15 फरवरी, रविवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य, बुध, शुक्र और राहु कुंभ राशि में, केतु सिंह राशि में तथा चंद्रमा मकर राशि में गोचर करेगा। इसके कारण त्रिकोण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है, जिसे अत्यंत फलदायी माना गया है।
ज्योतिष पंडित अमर डिब्बावाला के अनुसार इस बार ग्रहों की दुर्लभ पुनरावृत्ति हो रही है। ऐसा योग इससे पहले वर्ष 2007 में बना था। लगभग 19 साल बाद इसी प्रकार की ग्रह स्थिति में महाशिवरात्रि का पर्व पड़ रहा है, जिससे इस वर्ष का पर्व विशेष महत्व रखता है।
महाकाल मंदिर में शुरू हुई तैयारियां
शिखर धुलाई, रंग-रोगन और सफाई अभियान जारी
12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि को लेकर तैयारियां तेज कर दी गई हैं। 6 फरवरी से मंदिर के मुख्य शिखर की धुलाई, परिसर की रंग-रोगन, कोटितीर्थ कुंड की सफाई और आसपास के क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है। मंदिर परिसर में स्थित 40 मंदिरों की पुताई का कार्य अंतिम चरण में है। मंगलवार शाम कलेक्टर रोशन कुमार सिंह, मंदिर प्रशासक प्रथम कौशिक और समिति सदस्यों के साथ बैठक कर दर्शन व्यवस्था को अंतिम रूप देंगे।
चार प्रहर की पूजा से मिलती है सिद्धि और सफलता
शिव महापुराण के अनुसार महाशिवरात्रि पर चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है। यह पूजा प्रदोष काल से लेकर निशिथ काल (मध्य रात्रि) और ब्रह्म मुहूर्त तक की जाती है। श्रद्धालु अपने संकल्प के अनुसार विशेष पूजा-अनुष्ठान कर सकते हैं, जिससे मनोकामनाओं की पूर्ति और आध्यात्मिक उन्नति होती है।
ऐसे करें महाशिवरात्रि की पूजा
महाशिवरात्रि के दिन स्नान के बाद भगवान शिव का पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से पूजन करना चाहिए। व्रत रखने वाले श्रद्धालु अन्न ग्रहण न करें और क्रोध, नशा, लालच व नकारात्मक विचारों से दूर रहें। पूरे दिन “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप शुभ माना गया है। शिव पूजा उत्तर दिशा की ओर मुख करके करनी चाहिए। पूजा के समय माथे पर चंदन या भस्म का त्रिपुंड अवश्य लगाएं। शिवलिंग पर चढ़ी पुरानी सामग्री हटाकर ही नई सामग्री अर्पित करें। बिल्वपत्र धोकर दोबारा उपयोग किया जा सकता है।
शिवरात्रि विवाह का पर्व नहीं, शिव तत्व की आराधना का दिन
अखिल भारतीय पुजारी महासंघ विद्वत परिषद के रूपेश मेहता के अनुसार महाशिवरात्रि भगवान शिव की उत्पत्ति और शिवतत्व के प्राकट्य का पर्व है, न कि शिव-पार्वती विवाह का। शिव महापुराण में इसे ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार के अंत और सृष्टि चक्र की शुरुआत से जोड़ा गया है।
धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट है कि भगवान शिव का विवाह माता सती और माता पार्वती से अलग-अलग समय पर हुआ था और दोनों विवाह फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (महाशिवरात्रि) को नहीं हुए थे। इसी कारण महाशिवरात्रि का मूल उद्देश्य शिव भक्ति और साधना है।
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