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Agitation: दाम कम मिले तो मैं अपने बेटे को किसान नहीं, आतंकवादी बनाऊंगा

दाम कम मिले तो मैं अपने बेटे को किसान

किसान आंदोलन तेज: MSP पर खरीद की मांग, ठंड में दो रात से मंडी गेट पर डटे

Agitation: बड़वानी। जिले की खेतिया कृषि उपज मंडी में किसानों का विरोध प्रदर्शन लगातार दो रात से जारी है। किसान सरकार से अपनी उपज की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुनिश्चित करने और व्यापारियों द्वारा मनमाने दाम रोकने की मांग कर रहे हैं। कड़ाके की ठंड में किसान खुले आसमान के नीचे रातभर जमे रहे।

अधिकारियों से तीखी नोकझोंक—किसान बोला: “दाम न मिले तो बेटे को आतंकवादी बना दूंगा”

गुरुवार सुबह अपर कलेक्टर, एसडीओपी, मंडी सचिव और पुलिस अधिकारी किसानों को मनाने पहुंचे। इस दौरान गुस्से से भरे एक किसान ने कहा—
“दाम कम मिले तो मैं अपने बेटे को किसान नहीं, आतंकवादी बनाऊंगा।”
किसानों ने साफ कहा—“मनाने से नहीं, न्याय मिलने से आंदोलन खत्म होगा।”

दोहरी मार: फसलें बारिश से तबाह, मंडी में दाम भी नहीं

बड़वानी जिले के किसान इस समय दोहरी मार झेल रहे हैं—

  • अत्यधिक बारिश से पहले ही फसलें खराब हो चुकी हैं।
  • अब मंडियों में व्यापारियों की ओर से बहुत कम दाम दिए जा रहे हैं।

ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्र में मक्का, ज्वार, कपास और दलहन प्रमुख फसलें हैं। इस बार नुकसान पहले ही हो चुका था, ऊपर से बाजार में दाम गिर गए हैं।

मंडी में मक्का बेचने किसानों की परेशानी—6–7 रुपये किलो की पेशकश

खेतिया मंडी में किसान अपनी मक्का बेचने के लिए दो दिन से परेशान हैं।

  • व्यापारियों द्वारा सिर्फ 6–7 रुपये प्रति किलो की दर बताई जा रही है।
  • किसानों का कहना है—“इस भाव में हमें भारी नुकसान होगा।”

इस विरोध में किसानों ने सड़क पर मक्का फेंककर प्रदर्शन भी किया था।

जयस ब्लॉक अध्यक्ष विजू सोलंकी ने बताया कि वे दो दिन से मंडी में बैठे हैं, लेकिन उचित दाम कोई नहीं दे रहा। इससे किसानों में भारी नाराजगी है।

किसानों ने दी चेतावनी—अगर MSP तय न किया तो आंदोलन होगा उग्र

किसान कांतिलाल और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि सरकार समर्थन मूल्य सुनिश्चित करे और व्यापारियों की मनमानी पर रोक लगाए।
उन्होंने चेतावनी दी—
“जल्द समाधान नहीं मिला तो आंदोलन और तेज करेंगे।”

आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही

अत्यधिक वर्षा से बर्बाद फसलों के बाद अब उपज का सही मूल्य न मिलना किसानों के लिए नई मुश्किल बन गया है।
मजबूर अन्नदाता अपनी फसलें सड़क पर फेंककर विरोध कर रहे हैं, लेकिन प्रश्न वही है—
कब मिलेगा उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य?

फिलहाल किसानों और प्रशासन के बीच चर्चा जारी है। अधिकारी समाधान का आश्वासन दे रहे हैं, जबकि किसान अपनी पीड़ा और गुस्सा लगातार व्यक्त कर रहे हैं।

साभार… 

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