50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू
Major Decision: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 22 अप्रैल तक 50 से अधिक याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी। सुनवाई की शुरुआत सुबह 10:30 बजे सबरीमाला मंदिर रिव्यू केस से होगी।
- 🗓️ 7–9 अप्रैल: रिव्यू पिटीशनर अपनी दलीलें देंगे
- 🗓️ 14–16 अप्रैल: विरोधी पक्ष अपनी बात रखेगा
🏛️ किन 5 बड़े मुद्दों पर होगी सुनवाई?
1️⃣ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश
अदालत तय करेगी कि क्या सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार होना चाहिए।
👉 2018 में इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन केस में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
2️⃣ दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना प्रथा
- 2017 में सुनीता तिवारी ने इस प्रथा को चुनौती दी
- इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया
3️⃣ मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का अधिकार
- 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा ने याचिका दायर की
- मुस्लिम महिलाओं को नमाज पढ़ने की अनुमति की मांग
4️⃣ पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश
- गुलरुख एम गुप्ता का मामला
- शादी के बाद धार्मिक स्थलों में प्रवेश से रोके जाने का मुद्दा
5️⃣ मुस्लिम पर्सनल लॉ और लैंगिक समानता
अदालत यह तय करेगी कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखा जा सकता है।
📜 संवैधानिक टकराव: धर्म बनाम समानता
इस सुनवाई में खास तौर पर इन अनुच्छेदों पर विचार होगा:
- अनुच्छेद 25: धार्मिक स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 26: धार्मिक संस्थाओं की स्वतंत्रता
👉 कोर्ट इन अधिकारों के बीच संतुलन तय करेगा।
⏳ पिछली सुनवाई और विवाद
- 2018 में 4-1 बहुमत से महिलाओं को प्रवेश की अनुमति
- इसके बाद देशभर में विरोध और प्रदर्शन
- 2019 में 7 जजों की बेंच ने मामला 9 जजों को सौंपा
- कोविड-19 के कारण सुनवाई लंबित रही
🛕 क्या है सबरीमाला विवाद?
केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लंबे समय से विवाद रहा है।
- धार्मिक मान्यता: भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं
- इसी आधार पर महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी
👉 2018 के फैसले के बाद दो महिलाएं—
बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी—मंदिर में प्रवेश कर सकीं।
🧠 अलग-अलग पक्षों की राय
- केंद्र सरकार: शुरुआत में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में
- अखिल भारतीय संत समिति: धार्मिक मामलों में सीमित हस्तक्षेप
- ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: धार्मिक प्रथाओं पर कोर्ट निर्णय न करे
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