डॉक्टर अपने चिन्हित लैब में ही भेजते हैं टेस्ट कराने

Pathology Lab: बैतूल। जिले में मात्र चार पैथालाजिस्ट हैं और 23 पैथालाजी लैब चल रहे हैं। कलेक्शन सेंटर तो अनगिनत है जिनका स्वास्थ्य विभाग के पास रिकार्ड नहीं है। पैथालाजी लैब को लेकर सरकार ने कुछ महीनों पहले गाइडलाइन जारी की थी कि पैथालॉजिस्ट की उपस्थिति में ही सेम्पल की जांच की जाए। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार की गाइड लाइन हवा हवाई हो गई है। इसका पालन करवाने के लिए स्वास्थ्य विभाग कोई सख्त कदम नहीं उठा रहा है। कल सांध्य दैनिक बैतूलवाणी में यह खबर प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी कि स्वास्थ्य विभाग ने पैथालाजी लैब संचालकों से जानकारी मांगी थी लेकिन कुछ संचालकों ने ही जानकारी दी है। इसको लेकर एक्सपर्ट के रूप में वरिष्ठ पैथालाजिस्ट डॉ. डब्ल्यूए नागले से सांध्य दैनिक बैतूलवाणी ने चर्चा की तो उन्होंने बताया कि कुछ चिकित्सकों को कई पैथालाजी लैब संचालक कमिशन देते हैं इसलिए चिन्हित लैबों पर ही सेम्पल भेजे जाते हैं।
जिले में है 4 पैथालाजिस्ट

डॉ. डब्ल्यूए नागले ने बताया कि जिले में मात्र 4 पैथालाजिस्ट हैं जिसमें वे स्वयं इसके अलावा डॉ. अशोक बारंगा जो जिला अस्पताल से सेवानिवृत्त हुए है। डॉ. स्मिता राठी जिनका राठी हास्पिटल में स्वयं का पैथालाजी लैब है। इसके अलावा डॉ. अंकिता सीते जो जिला अस्पताल में एमडी पैथालाजिस्ट के पद पर पदस्थ हैं। डॉ. नागले ने सवाल उठाया कि जब चार पैथालाजिस्ट हैं तो जिले में इतने सारे लैब क्यों संचालित हो रहे हैं? और इन लैबों में कौन पैथालॉजिस्ट की उपस्थिति में जांच हो रही है यह सार्वजनिक होना चाहिए। जब सरकार ने गाइड लाइन जारी की है कि पैथालॉजिस्ट की उपस्थिति में सेम्पल की जांच होना चाहिए तो बाहर के पैथालॉजिस्ट अपनी उपस्थिति में जांच करवा रहे हैं क्या, इसकी भी जांच होनी चाहिए?
बिना वजह की भी होती हैं जांच
डॉक्टर नागले ने बताया कि कमिशन के कारण कई चिकित्सक बिना वजह की भी जांच करवाते हैं। कोई मरीज इलाज के लिए जाता है तो उसकी विटामिन बी, विटामिन बी 12, थॉयराइड जैसी जांचें बिना लक्षण के ही करवा दी जाती है। इसके अलावा किसी भी मरीज को एक दिन बुखार चढ़ता है तो उसकी टाइफाइड, किडनी, लीवर की भी जांच करवाई जाती है जबकि अगर किसी को एक हफ्ते तक बुखार चढ़ा है तो ऐसी स्थिति में संबंधित मरीज की इस तरह की जांच करवानी चाहिए। लेकिन कमिशन के कारण मरीजों का आर्थिक शोषण किया जाता है।
अयोग्य कर रहे जांच
डॉ. नागले से जब पूछा गया कि अलग-अलग लैबों में जांच होने के अलग-अलग रिजल्ट क्यों आते हैं? तो उन्होंने बताया कि अगर पैथालॉजिस्ट जांच करेगा तो रिपोर्ट सही आएगी। वहीं अगर अयोग्य व्यक्ति जांच करेगा तो निश्चित ही जितनी जगह जांच कराई जाएगी वह अलग-अलग आएगी। उन्होंने बताया कि लैब में मशीनों का कैलीब्रिशेन मतलब मशीन की जांच और सेटिंग ठीक तरह से होनी चाहिए अगर नहीं है तो रिपोर्ट गलत आएगी। इसके अलावा रिऐजेंट मतलब वह कैमिकल जिससे टेस्ट की प्रक्रिया कराई जाती है अगर इसकी क्वालिटी अच्छी है तो रिपोर्ट सही आएगी अन्यथा गलत आएगी। उन्होंने बताया कि यह वही व्यक्ति कर सकता है जो पैथालॉजिस्ट है।
टेक्रिशियन चला रहे लैब
डॉ. नागले ने यह भी बताया कि पैथालॉजिस्ट की कमी या बाहर के पैथालॉजिस्ट से साइन लेकर कई टेक्रिशियन लैब चला रहे हैं। कई जगह तो कलेक्शन सेंटर पर ही जांच हो जा रही है। टेक्रिशियन जांच रिपोर्ट की व्याख्या भी कर देता है और मरीजों को डरा देता है। गलत रिपोर्ट से मरीज का गलत इलाज हो जाता है इससे मरीज की जान पर भी बन आ जाती है। उन्होंने यह भी बताया कि नागपुर, भोपाल में जो कारर्पोरेट हास्पिटल हैं उसका ट्रेंड अब बैतूल में भी आ गया है। कोई मरीज डॉक्टर के पास जाता है तो उसकी सही जांच के अलावा अन्य जांचें भी बेवजह कराई जाती है।
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