फार्मा सेक्टर के कच्चे माल पर MIP लागू करने की तैयारी
Pharmaceutical Inputs: देश में GST रेट घटाने के बाद अब केंद्र सरकार ने फार्मास्यूटिकल सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (Pharmaceutical Inputs) पर मिनिमम इंपोर्ट प्राइस (MIP) तय करने का बड़ा फैसला लिया है। इस कदम का सीधा असर दवा उद्योग पर पड़ सकता है और कई दवाएं महंगी हो सकती हैं।
फार्मा इंडस्ट्री के विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त की है, जबकि कुछ इसे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं।
❗ MIP क्या है और क्यों बढ़ेगी दवाओं की कीमत?
MIP यानी न्यूनतम आयात मूल्य—इससे किसी उत्पाद को एक निश्चित कीमत से कम पर आयात नहीं किया जा सकता।
जिन कच्चे माल पर MIP लगाने पर विचार:
- Penicillin-G
- 6APA (6-Amino Penicillanic Acid)
- Amoxicillin
ये सभी एंटीबायोटिक दवाओं के उत्पादन में अत्यंत जरूरी API (Active Pharmaceutical Ingredient) हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन कच्चे माल पर MIP लागू होने से:
- भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ेगी
- API महंगे होंगे
- दवाएं महंगी हो जाएंगी
- सीधा असर मरीजों पर पड़ेगा
⚠ 10,000 से ज़्यादा MSME पर संकट
ET की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित MIP लागू होने पर:
- 10,000+ MSME यूनिट्स प्रभावित होंगी
- कई छोटे यूनिट्स को बंद होना पड़ सकता है
- करीब 2 लाख लोगों की नौकरी पर खतरा
इसके पहले भी सरकार ने:
- ATS-8 के आयात पर MIP: 111 डॉलर/किग्रा (30 सितंबर 2026 तक)
- सल्फाडायजीन पर MIP: 1,174 रुपये/किग्रा (30 सितंबर 2025 तक)
🇮🇳 सकारात्मक पहलू: आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
भारत दवा उद्योग में वैश्विक शक्ति है, लेकिन कच्चे माल के लिए 70% से अधिक निर्भरता चीन पर है।
MIP लागू करने के समर्थकों का कहना है कि:
- यह कदम घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देगा
- देश की निर्भरता कम होगी
- PLI (Production-Linked Incentive) स्कीम को मजबूत सपोर्ट मिलेगा
2020 में PLI स्कीम का उद्देश्य भी API के उत्पादन में देश को सक्षम बनाना था।
⚠ लेकिन विवाद भी…
इंडस्ट्री के जानकारों की आपत्तियां:
- PLI स्कीम का मकसद कीमतें नियंत्रित करना नहीं था
- MIP लागू होने से यह संदेश जा सकता है कि PLI पाने वाली कंपनियां अतिरिक्त सुरक्षा चाहती हैं
- घरेलू बाजार में कृत्रिम महंगाई पैदा होगी
- छोटे उद्योग प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगे
- साभार…
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