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Responsibility: बीजेपी में ‘बसंत’ का इंतजार

बीजेपी में ‘बसंत’ का

बसंत पंचमी के बाद आ सकती है निगम-मंडल नियुक्तियों की सूची

सत्ता से दूर बैठे पूर्व मंत्रियों-विधायकों को मिल सकती है जिम्मेदारी

Responsibility: भोपाल। अपनी ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद सत्ता से किनारे बैठे पूर्व मंत्री, वर्तमान विधायक और पूर्व विधायकों का इंतजार अब एक साल का हो चुका है। अब जैसे-जैसे बसंत पंचमी नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे प्रदेश के सूने पड़े निगम, मंडल और प्राधिकरणों में नियुक्तियों को लेकर उम्मीदें भी तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि बीजेपी इन नेताओं को ‘बसंत में बहार’ की सौगात दे सकती है।


क्या बसंत पंचमी के बाद आएगी सूची?

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद पार्टी लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गई थी। लोकसभा चुनाव संपन्न हुए छह महीने से अधिक का समय बीत चुका है, जबकि कुल मिलाकर करीब डेढ़ साल से निगम-मंडल नियुक्तियों का इंतजार जारी है। मंत्री पद की दौड़ में शामिल रहे कई नेता अब पूर्व मंत्री बनकर यह आस लगाए बैठे हैं कि उन्हें निगम-मंडल या प्राधिकरणों में जिम्मेदारी मिलेगी। वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव पहले ही कह चुके हैं—

“हमारे भी दिन आएंगे।”
लेकिन पार्टी के भीतर सवाल अब भी वही है— कब?


पहले मकर संक्रांति, अब बसंत पंचमी

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, पहले कहा गया था कि निगम-मंडल की सूची मकर संक्रांति के बाद जारी हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अब नई संभावित तारीख बसंत पंचमी के बाद बताई जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 23 जनवरी तक स्विट्जरलैंड के दावोस दौरे से लौटेंगे। माना जा रहा है कि लौटने के बाद वे बसंत पंचमी के बाद अंतिम दौर का मंथन करेंगे, जिसके बाद निगम-मंडल और प्राधिकरणों की सूची जारी की जा सकती है। सूत्रों का दावा है कि 30 से अधिक नेताओं के नाम लगभग फाइनल हो चुके हैं।


पार्टी के सामने दोहरी चुनौती

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश भटनागर के अनुसार,

“मंत्री पद से बाहर हुए नेताओं के लिए निगम-मंडल ही आखिरी राजनीतिक ठिकाना बचता है। ऐसे में उनकी बेचैनी स्वाभाविक है। कई वरिष्ठ नेता, पूर्व मंत्री और कम अंतर से चुनाव हारे चेहरे अभी भी बिना दायित्व के हैं। पार्टी के सामने व्यक्ति ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन की भी बड़ी चुनौती है।”


2026 की राजनीति का असर

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2026 की शुरुआत के साथ ही संगठनात्मक और क्षेत्रीय संतुलन साधना बीजेपी के लिए जरूरी हो गया है। निगम-मंडल नियुक्तियां सिर्फ पद भरने का मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संतोष, संगठनात्मक मजबूती और भविष्य की रणनीति से भी जुड़ी हैं।

साभार… 

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