Proof: लंदन। वैज्ञानिकों को दक्षिण अफ्रीका में ऐसे चौंकाने वाले प्रमाण मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि शुरुआती इंसान सिर्फ ताकत के बल पर नहीं, बल्कि योजना, धैर्य और वैज्ञानिक समझ के साथ शिकार करता था। यह महत्वपूर्ण खोज दक्षिण अफ्रीका के क्वाज़ुलू-नटाल प्रांत स्थित उम्लत्तुजाना रॉक शेल्टर में हुई है।
खुदाई के दौरान वैज्ञानिकों को क्वार्ट्ज पत्थर से बने तीरों के सिरे मिले हैं, जिन पर जहर के स्पष्ट निशान पाए गए। इस शोध को स्वीडन और दक्षिण अफ्रीका के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इन तीरों पर लगाया गया जहर शिकार को तुरंत नहीं मारता था, बल्कि उसे धीरे-धीरे कमजोर करता था। इससे घायल जानवर ज्यादा दूर तक नहीं भाग पाता था और शिकारी उसे आसानी से पकड़ लेते थे। यह तरीका दिखाता है कि उस समय के इंसान रणनीति, धैर्य और व्यवहारिक ज्ञान का इस्तेमाल करते थे, न कि सिर्फ शारीरिक बल का।
शोध में यह भी सामने आया कि तीरों पर लगाया गया जहर ‘बूफोन डिस्टिचा’ नामक एक स्थानीय पौधे से तैयार किया जाता था, जो आज भी दक्षिण अफ्रीका में पाया जाता है और बेहद विषैला माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जहर चूहों को 20 से 30 मिनट में मार सकता है, जबकि इंसानों में इससे मतली, आंखों की रोशनी में परेशानी और मांसपेशियों की कमजोरी जैसे लक्षण हो सकते हैं।
हैरानी की बात यह है कि यही जहर बाद के ऐतिहासिक काल में इस्तेमाल किए गए तीरों पर भी पाया गया है। इससे पहले वैज्ञानिक मानते थे कि जहरीले तीरों का इस्तेमाल 4,000 से 8,000 साल पहले शुरू हुआ था, जिसके प्रमाण मिस्र और दक्षिण अफ्रीका से मिले थे। लेकिन करीब 60,000 साल पुराने इन तीरों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है और यह साबित कर दिया है कि इंसान बहुत पहले ही उन्नत तकनीक और वैज्ञानिक सोच विकसित कर चुका था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि हजारों साल बाद भी तीरों पर जहर के अवशेष सुरक्षित मिले। रासायनिक जांच से पता चला कि ये विषैले पदार्थ मिट्टी में बेहद लंबे समय तक स्थिर रह सकते हैं। यह खोज मानव इतिहास और शुरुआती तकनीकी विकास की समझ को एक नया आयाम देती है।
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