Argument:भोपाल/जबलपुर। मध्यप्रदेश में कर्मचारियों की पदोन्नति को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर है। गुरुवार को हाई कोर्ट जबलपुर में हुई सुनवाई में सरकार ने कहा कि पिछले नौ साल से पदोन्नतियां रुकी हुई हैं, जिससे कर्मचारी निराश और हतोत्साहित हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है, इसलिए सरकार चाहती है कि सशर्त पदोन्नति दी जाए। यदि फैसला सरकार के पक्ष में आता है, तो दिसंबर तक सभी पात्र कर्मचारियों को एक-एक पदोन्नति मिल सकती है।
सरकार का पक्ष
- वरिष्ठ अधिवक्ता सीएस वैद्यनाथन की अनुपस्थिति में सरकार ने सुनवाई आगे बढ़ाने का आग्रह किया, जिसे अदालत ने स्वीकार किया।
- तर्क यह दिया गया कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है, इसलिए पदोन्नति का सिलसिला शुरू किया जाए तो वह अंतिम निर्णय पर निर्भर रहेगा।
- प्रदेश के साढ़े सात लाख नियमित कर्मचारियों में से 3.5–4 लाख कर्मचारी पदोन्नति के पात्र हैं।
कर्मचारियों का विरोध
- सपाक्स संगठन ने आपत्ति जताई कि सरकार जब मान चुकी है कि पुराने नियम दोषपूर्ण थे और हाई कोर्ट ने उन्हें निरस्त किया था, तो फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका वापस लेने से परहेज क्यों है?
- सामान्य वर्ग के कर्मचारियों का कहना है कि यदि नियम गलत थे तो पूर्व की पदोन्नतियां रद्द कर वरिष्ठता सूची नए सिरे से बने।
- आरोप है कि नए नियम भी सामान्य वर्ग के हितों का पर्याप्त संरक्षण नहीं कर रहे हैं।
विभागों की तैयारियां
- नगरीय विकास, लोक निर्माण और विधानसभा सचिवालय सहित कई विभागों ने पदोन्नति समिति गठित कर सेवा अभिलेखों के आधार पर प्रस्ताव तैयार कर लिए हैं।
- सरकार की मंशा है कि जल्द अनुमति मिलने पर दिसंबर तक पात्र कर्मचारियों को पदोन्नति दे दी जाए।
- साभार…
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