आदिवासी अंचल में खुशहाली की उम्मीद, वन विभाग ने जारी की चेतावनी
Fragrance: चिचोली। चिचोली और भीमपुर ब्लॉक के सुदूर वनांचल इन दिनों महुए की भीनी-भीनी खुशबू से महक उठे हैं। फागुन की विदाई और चैत्र के आगमन के साथ सतपुड़ा की वादियों में महुए का टपकना शुरू हो गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य और उल्लास का माहौल बन गया है।
🌳 आदिवासियों के लिए ‘कल्पवृक्ष’ है महुआ
जनजातीय समाज के लिए महुआ का पेड़ जीवन का आधार माना जाता है। यह न केवल उनकी आजीविका का प्रमुख स्रोत है, बल्कि उनकी परंपरा और संस्कृति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
महुआ झड़ने से पहले ही ग्रामीण अपने-अपने पेड़ों के नीचे साफ-सफाई कर कपड़े का टुकड़ा बांधकर अपनी पहचान सुनिश्चित करते हैं। परंपरा के अनुसार, जिस पेड़ पर जिसका चिन्ह होता है, महुआ बीनने का अधिकार भी उसी का होता है।
इस वर्ष अनुकूल मौसम के चलते क्षेत्र में महुए की बंपर आवक देखी जा रही है, जिससे आदिवासी परिवारों में आर्थिक समृद्धि की उम्मीद जगी है।
✍️ कवि की पंक्तियां हुई साकार
महुए की इसी मादक खुशबू को शब्दों में पिरोते हुए भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा था—
“जब भी होली पास आती, सरसराती घास गाती, और महुए से लपकती मस्त करती बास आती।”
आज वनांचल की स्थिति को देखकर ये पंक्तियां पूरी तरह जीवंत प्रतीत हो रही हैं। चारों ओर बिखरे महुए के फूल और उनकी सुगंध वातावरण को मोहक बना रही है।
⚠️ जंगलों को खतरा: आग लगाने से बचें
जहां एक ओर महुए की आवक से ग्रामीणों में खुशी है, वहीं दूसरी ओर वन संपदा पर खतरा भी मंडरा रहा है।
अक्सर महुआ बीनने के लिए पेड़ों के नीचे की सूखी घास साफ करने के उद्देश्य से आग लगा दी जाती है, जो हवा के साथ फैलकर बड़े जंगलों में आग का रूप ले सकती है। इससे वन्यजीवों और वन संपदा को भारी नुकसान होता है।
🌱 वन विभाग की अपील
वन विभाग ने ग्रामीणों से अपील की है कि:
- महुआ एकत्र करने के लिए आग का उपयोग न करें
- जंगलों की सुरक्षा में सहयोग करें
👉 “जंगल हमारी अमूल्य धरोहर हैं, इन्हें सुरक्षित रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।”
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