आमला विधानसभा के राजनैतिक इतिहास पर इंटरव्यूह
Interview:बैतूल। बैतूलवाणी के रू-ब-रू कार्यक्रम में बैतूल लोकसभा एवं बैतूल विधानसभा के बाद जिले के चिंतक, विचारक एवं वरिष्ठ राजनैतिक समीक्षक नवनीत गर्ग द्वारा आमला विधानसभा का राजनैतिक परिदृश्य बताया गया है। पढि़ए आमला विधानसभा में अब तक हुए राजनैतिक घटनाक्रम के संपादितअंश।
संजय शुक्ला- आमला सीट कब बनी और पहले विधायक बनने का गौरव किसे मिला। पहले यह (1962 से 1977) क्षेत्र किस विधानसभा में शामिल थे।
नवनीत गर्ग- आमला सीट 1977 में बनी और कांग्रेस गुरुबक्श अतुलकर एडभोकेट इस विधानसभा के पहले विधायक निर्वाचित हुए।
संजय शुक्ला- पहले यह क्षेत्र किस विधानसभा में शामिल था?
नवनीत गर्ग- 1962 में 1977 तक यह क्षेत्र मुलताई सीट में था।
संजय शुक्ला– इस सीट से कांग्रेस कब-कब जीती। आखरी बार कब सफल हुई पार्टी।
नवनीत गर्ग- 1977, 1980, 1993 में गुरुबक्श अतुलकर और 2003 में सुनीता बेले जीती। इसके बाद चार चुनाव में कांग्रेस हजारों में भाजपा से हारी। 04. इस सीट से ऐसा कौन सा नेता है जो दो पार्टियों से लड़ा और दोनों बार सफल नहीं हुआ।
संजय शुक्ला- इस क्षेत्र में ऐसे कौन से नेता है जो कांग्रेस से लडक़र हारे लेकिन भाजपा से दो बार रिकार्ड मतों से जीते।
नवनीत गर्ग- चैतराम मानेकर एक ऐसा नाम है जो 1998 में कांग्रेस की टिकट पर आमला विधानसभा सीट पर चुनाव लड़ते हैं और मात्र 1100 वोटों से हार जाते हैं। लेकिन जब भाजपा में शामिल होकर 2008 और 2013 में चुनाव लड़े तो दोनों बार रिकार्ड मतों से जीते। 71 साल में इतनी बड़ी जीत जिले में किसी को नहीं मिली। 2008 में 30 हजार से ज्यादा तो 2013 तो 2013 में 40 हजार मतों से जीते थे।
संजय शुक्ला- इस क्षेत्र से ऐसा कौन सा नेता है जो दो पार्टियों से लड़ा और दोनों बार हारा?
नवनीत गर्ग- सारनी के इंटक लीडर रहे बाबू बेचनराम 1985 में कांग्रेस की टिकट पर लड़े लेकिन हार गए। वहीं 2008 में शरद पंवार की एनसीपी से लड़े लेकिन इस चुनाव में सफल नहीं हुए।
संजय शुक्ला- आमला क्षेत्र जब मुलताई सीट में शामिल था तब हर बार कांग्रेसी या कांग्रेस के विचारधारा का नेता जीता। लेकिन बाद में कांग्रेस के इस गढ़ में भाजपा मजबूत होती गई। ऐसा क्यों हुआ?
नवनीत गर्ग- 1962 एवं 1967 में कांग्रेस के बालकृष्ण पटेल जीते, 1972 में कांग्रेस के विद्रोही एवं निर्दलीय उम्मीदवार राधाकृष्ण गर्ग जोते। 1977 में आमला अलग सीट बनी उसके बाद हुए 11 चुनावों में कांग्रेस को मात्र 4 बार एवं भाजपा को 7 बार जीत मिली। इस सीट से कांग्रेस के गुरुबक्श अतुलकर और सुनीता बेले जीती। जबकि भाजपा के कन्हैयालाल बोलेकर 2 बार, हीरालाल चंदेलकर, चेतराम मानेकर 2 बार एवं डॉ. योगेश पंडाचे 2 बार जीते। बताया जाता है कि इस सीट पर जब से कांग्रेस के कमलनाथ का टिकट वितरण में हस्तक्षेप बढ़ा तब से उनके द्वारा रिकमंड हर उममीदवार चुनाव हारा। चाहे वो बेचनयम हो, सुंदरलाल वाईकर हो, चैतराम मानेकर हो, किशोर बरदे हो या दो बार लगातार लड़े मनोज मालवे हो। ये सभी हारते गए और कांग्रेस इस क्षेत्र से कमजोर होती गई।
संजय शुक्ला- वो क्या वाक्या है जब पूर्व डिप्टी कलेक्टर निशा बांगरे को कांग्रेस ने अंतिम समय में धोखा दे दिया।
नवनीत गर्ग -लगभग दो वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने पूरे मध्यप्रदेश में 230 में से 229 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी और यह चर्चा जोरों पर थी कि चुनाव लडऩे के लिए डिप्टी कलेक्टर जैसे बड़ी नौकरी छोडऩे वाली निशा बांगरे को टिकट देने के लिए कांग्रेस ने यह सीट होल्ड पर रखी है। बताया जाता है कि कमलनाथ के दबाव के चलते हाई कमान ने 2018 में लगभग 20 हजार से हारे मनोज मालवे को पुन: टिकट दे दी और वो दोबारा 12 हजार के बड़े अंतर से हार गए। राजनैतिक समीक्षकों का तब मानना था कि यदि निशा बांगरे चुनाव मैदान में होती तो शायद 2023 में बैतूल जिले में कांग्रेस का खाता खुल सकता था।
संजय शुक्ला- इस सीट से चुनाव लडऩे वाले कई नेता दल बदलते हैं। ऐसे कौन से नेता रहे।
नवनीत गर्ग- कई नाम है जिनमें बेचनराम 1985 में कांग्रेस से 2008 में एनसीपी से लड़े। सुनीता बेले 2003 में कांग्रेस से लड़ी, जोती। आज भाजपा में है। किशोर वरदे 2008 में कांग्रेस से लड़े आज भाजपा की ओर से सारनी नगर पालिका अध्यक्ष है। 1998 में कांग्रेस से लडक़र हारने वाले चैतराम मानेकर 2008 एवं 2013 में भाजपा से लड़े जीते। फिर कांग्रेस में चले गए। अब वापस भाजपा में है।
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