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Mystery: 7 हजार साल पुरानी मिली संस्कृति की झलक

7 हजार साल पुरानी मिली संस्कृति

ASI की खुदाई से ‘चाल्कोलिथिक’ युग के रहस्य उजागर

Mystery: नई दिल्ली | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा ओडिशा के खुर्दा जिले में की गई खुदाई में ‘चाल्कोलिथिक’ (ताम्र-पाषाण) युग की ऐतिहासिक सभ्यता के अवशेष मिले हैं। भुवनेश्वर के पास तीरीमल गांव के नजदीक नारा हुडा नाम की जगह पर खुदाई के तीसरे चरण में यह खोज की गई है, जो पूर्वी भारत की प्राचीन संस्कृति को उजागर करती है।

🏡 मिट्टी की गोल झोपड़ियाँ और लाल आंगन

ASI टीम के प्रमुख पुरातत्ववेत्ता पीके दीक्षित के अनुसार, खुदाई में मिट्टी से बनी गोल झोपड़ियाँ, खंभे लगाने के छेद, और लाल मिट्टी से ढका आंगन मिला है, जिससे पता चलता है कि प्राचीन समय में यहां लोग स्थायी रूप से बसे हुए थे। उन्होंने खेती की शुरुआत की थी और एक व्यवस्थित जीवनशैली विकसित की थी।

🔍 खुदाई में क्या-क्या मिला

  • तांबे और हड्डी से बनी वस्तुएँ
  • पत्थर और लोहे के औजार, चमकाने वाले उपकरण
  • मिट्टी के जानवर, कांच की चूड़ियाँ
  • खिलौना गाड़ी के पहिए, तख्तियाँ
  • कीमती पत्थर और मिट्टी की मालाएँ

ये अवशेष दर्शाते हैं कि यह सभ्यता न केवल तकनीकी रूप से उन्नत थी, बल्कि कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी समृद्ध थी।

📜 क्या है ‘चाल्कोलिथिक युग’

चाल्कोलिथिक युग’ यानी ताम्र-पाषाण युग, नवपाषाण युग के बाद आया कालखंड है (लगभग 4000 ई.पू. से 2000 ई.पू.)। इस काल में मनुष्य ने पत्थर के साथ-साथ तांबे का उपयोग शुरू किया। यही वह दौर था जब कृषि, पशुपालन और स्थायी बस्तियाँ विकसित होने लगीं।

🌍 भारत के प्रमुख ताम्रपाषाण स्थल

  • गिलुंद, बागोर (राजस्थान)
  • दैमाबाद, इनामगांव, नेवासा (महाराष्ट्र)
  • नवदाटोली, नागदा, कायथा, एरण (मध्य प्रदेश)

इन स्थलों पर मिली बस्तियाँ हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन मानी जाती हैं।

🏺 तीन अलग-अलग युगों की बस्तियाँ

नारा हुडा क्षेत्र में तीन कालखंडों के प्रमाण मिले हैं:

  1. चाल्कोलिथिक युग (2000 ई.पू. – 1000 ई.पू.)
  2. लौह युग (1000 ई.पू. – 400 ई.पू.)
  3. प्रारंभिक ऐतिहासिक युग (400 ई.पू. – 200 ई.पू.)

यह बताता है कि यह क्षेत्र हजारों वर्षों तक आबाद रहा।

🌊 महानदी डेल्टा की गौरवशाली विरासत

नारा हुडा की संस्कृति गोलाबई सासन, हरिराजपुर, और सुआबरेई जैसे महानदी डेल्टा क्षेत्र की अन्य पुरानी बस्तियों से जुड़ी मानी जा रही है। यहां के लोग शिशुपालगढ़ से भी पहले संगठित जीवन जीते थे, हालांकि लौह युग में यह जीवनशैली धीरे-धीरे कमजोर होती गई।

🔬 ASI क्यों कर रहा है खुदाई

ASI की यह खुदाई इतिहास को जीवंत करने का प्रयास है। इस क्षेत्र में पहले भी neo-chalcolithic युग की वस्तुएं मिली थीं। खुदाई से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि हजारों साल पहले लोग कैसे रहते, क्या खाते और कैसे काम करते थे। यह भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए सोने के खजाने से भी अधिक मूल्यवान है।

साभार…. 

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