भारी नुकसान के बावजूद संघर्ष लंबा खींचने की कोशिश, ‘अस्तित्व बचाने’ पर फोकस
Rising Stress: मध्य पूर्व में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं, जहां ईरान एक बड़े भू-राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ते टकराव के बीच ईरान को हाल के हफ्तों में सैन्य और नेतृत्व स्तर पर भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके बावजूद उसकी रणनीति पीछे हटने की नहीं, बल्कि संघर्ष को लंबा खींचने की दिखाई दे रही है।
अंदरूनी हालात बिगड़े, फिर भी आक्रामक रुख
ईरान के भीतर जरूरी सामान की कमी, बुनियादी ढांचे को नुकसान और कड़े सुरक्षा हालात आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। इसके बावजूद बची हुई नेतृत्व व्यवस्था लगातार आक्रामक बयान दे रही है, जिससे साफ है कि वह कमजोरी दिखाने के बजाय ‘लंबे संघर्ष’ का संदेश देना चाहती है।
जीत नहीं, ‘टिके रहना’ असली मकसद
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इस युद्ध में पारंपरिक जीत हासिल करने के बजाय अपने अस्तित्व को बचाने और विरोधियों पर दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। उसका लक्ष्य ऐसा माहौल बनाना है, जिसमें युद्ध को जारी रखना विरोधियों के लिए बहुत महंगा साबित हो और वे समझौते के लिए मजबूर हो जाएं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना दबाव का हथियार
होर्मुज जलडमरूमध्य इस पूरे संघर्ष का सबसे अहम केंद्र बन गया है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है।
ईरान संकेत दे चुका है कि युद्ध के बाद इस मार्ग के लिए नए नियम बनाए जा सकते हैं, जिससे वह अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति मजबूत कर सके।
युद्ध के बाद की शर्तों पर नजर
ईरान अब सिर्फ वर्तमान लड़ाई नहीं, बल्कि ‘पोस्ट-वॉर’ स्थिति पर भी ध्यान दे रहा है। वह युद्ध खत्म होने के बाद:
- नुकसान की भरपाई (मुआवजा) चाहता है
- क्षेत्र में नई सुरक्षा व्यवस्था बनाना चाहता है
- खाड़ी देश और अमेरिका के रिश्तों में बदलाव की मांग कर सकता है
लगातार हमले और बढ़ता क्षेत्रीय खतरा
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं, जिनका असर ओमान, UAE, बहरीन, कुवैत, कतर, इराक और सऊदी अरब तक देखा गया है। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में अस्थिरता बढ़ गई है और वैश्विक ऊर्जा बाजार भी प्रभावित हुआ है।
नई सैन्य रणनीति और नए कमांडर
ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने पहले से ऐसी रणनीति तैयार की थी, जिसमें बड़े हमलों की स्थिति में छोटे-छोटे यूनिट्स अलग-अलग जगहों से काम कर सकें। पुराने वरिष्ठ अधिकारियों की मौत के बाद अब नई पीढ़ी के कमांडर फैसले ले रहे हैं, जो अधिक आक्रामक और लचीली रणनीति अपना रहे हैं।
खाड़ी देशों का रुख और संभावित बदलाव
अब तक संयुक्त अरब अमीरात समेत अधिकांश खाड़ी देश सीधे युद्ध में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन उन पर हुए हमलों के बाद उनका रुख सख्त होता दिख रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष के बाद ये देश इजराइल के और करीब आ सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव संभव है।
निष्कर्ष: अनिश्चित भविष्य, बढ़ता वैश्विक जोखिम
मिडिल ईस्ट में जारी यह टकराव सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का रूप लेता जा रहा है। तेल आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। ईरान की रणनीति फिलहाल ‘जंग जीतने’ की नहीं, बल्कि ‘जंग को महंगा बनाने’ की है—अब देखना यह होगा कि यह रणनीति उसे मजबूती देती है या और बड़े संकट की ओर ले जाती है।
साभार…
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