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Increase: मध्य प्रदेश में बिजली दरों में 10.19% बढ़ोतरी का प्रस्ताव, लाखों उपभोक्ताओं पर बढ़ेगा बोझ

मध्य प्रदेश में बिजली दरों में 10.19%

1 अप्रैल 2026 से लागू हो सकती हैं नई दरें, हर महीने 300 रुपये तक बढ़ सकता है बिल

Increase: भोपाल। मध्य प्रदेश के एक करोड़ से अधिक घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को जल्द ही बड़ा झटका लग सकता है। प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए बिजली दरों में 10.19 प्रतिशत की बढ़ोतरी का प्रस्ताव मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (MPERC) को भेजा है।

यदि आयोग इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देता है, तो नई दरें 1 अप्रैल 2026 से लागू हो सकती हैं। इससे आम परिवारों के मासिक बजट पर सीधा असर पड़ेगा। अनुमान है कि हर घरेलू उपभोक्ता को सालाना करीब 3,600 रुपये तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है, यानी हर महीने लगभग 300 रुपये का बोझ बढ़ सकता है।


400 यूनिट खपत पर कितना बढ़ेगा बिल?

बिजली कंपनियों के प्रस्ताव को ऐसे समझिए:

  • यदि कोई परिवार हर महीने 400 यूनिट बिजली उपयोग करता है, तो उसका मौजूदा बिल लगभग 3,250 रुपये आता है।
  • प्रस्तावित बढ़ोतरी लागू होने पर यही बिल 3,550 रुपये या उससे अधिक हो सकता है।
  • यानी करीब 300 रुपये प्रति माह और सालाना 3,600 रुपये का अतिरिक्त खर्च।

यह प्रस्ताव फिलहाल मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग के विचाराधीन है। जनसुनवाई की प्रक्रिया जारी है, जहां उपभोक्ता अपनी आपत्तियां और सुझाव दर्ज करा सकते हैं।


कंपनियों का तर्क: 6,044 करोड़ रुपये का घाटा

बिजली कंपनियों का कहना है कि वे भारी वित्तीय संकट से गुजर रही हैं। इस बार उन्होंने कुल 6,044 करोड़ रुपये के घाटे की भरपाई के लिए दर बढ़ाने की मांग की है।

कंपनियों के प्रमुख दावे

  1. संचित घाटा: प्रदेश की तीनों वितरण कंपनियां (पूर्व, मध्य और पश्चिम क्षेत्र) मिलाकर लगभग 42,375 करोड़ रुपये के संचयी घाटे में हैं।
  2. पुराने प्रस्ताव अस्वीकार: 2014-15 से 2022-23 के बीच मांगी गई 3,451 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी को मंजूरी नहीं मिली।
  3. स्मार्ट मीटर खर्च: 820 करोड़ रुपये स्मार्ट मीटर लगाने में खर्च हुए, जिसे अब उपभोक्ताओं से वसूलने का प्रस्ताव है।
  4. बिजली खरीद पर अतिरिक्त खर्च: लगभग 300 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार।

कंपनियों का कहना है कि इन कारणों से दरें बढ़ाना आवश्यक है।


बढ़ोतरी पर उठ रहे गंभीर सवाल

1. कोयले पर जीएसटी सेस हटने के बावजूद राहत क्यों नहीं?

पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने कोयले पर लगने वाला 400 रुपये प्रति टन का जीएसटी कंपेंसेशन सेस हटा दिया था। विशेषज्ञों के अनुसार इससे बिजली उत्पादन लागत में प्रति यूनिट 17-18 पैसे की कमी आनी चाहिए थी।

सवाल यह उठ रहा है कि जब लागत कम हुई है, तो उपभोक्ताओं को राहत देने के बजाय 10.19% बढ़ोतरी क्यों?

2. स्मार्ट मीटर पर वादाखिलाफी?

स्मार्ट मीटर लगाते समय दावा किया गया था कि इसकी लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाली जाएगी। कहा गया था कि बिजली चोरी कम होगी और लाइन लॉस घटेगा, जिससे खर्च की भरपाई हो जाएगी।

अब 820 करोड़ रुपये का खर्च सीधे उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी को कई संगठन वादा खिलाफी मान रहे हैं।


4,800 करोड़ की रुकी वसूली का पेंच

विधानसभा चुनाव 2023 से पहले 31 अगस्त 2023 तक के बढ़े हुए घरेलू बिजली बिल और बकाया की वसूली रोक दी गई थी। यह राशि लगभग 4,800 करोड़ रुपये बताई जा रही है।

सरकार ने वादा किया था कि इसकी भरपाई वह खुद करेगी, लेकिन अब तक वितरण कंपनियों को यह राशि नहीं मिली है।

इसके अलावा कंपनियां पुराने बकाए की वसूली की भी तैयारी में हैं:

  • घरेलू उपभोक्ताओं से: 1,373 करोड़ रुपये
  • कृषि उपभोक्ताओं से: 2,790 करोड़ रुपये

यह मुद्दा भी जनसुनवाई में प्रमुखता से उठ रहा है।


सरकार का बयान और प्रस्ताव में विरोधाभास

हाल ही में भोपाल में ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने कहा था कि सरकार का प्रयास है कि उपभोक्ताओं पर कोई अतिरिक्त बोझ न पड़े और बिजली दरें न बढ़ें। उन्होंने दावा किया था कि 2028 तक तीनों वितरण कंपनियां घाटे से बाहर आ जाएंगी।

उन्होंने यह भी बताया था कि प्रदेश में 1 करोड़ 35 लाख उपभोक्ता हैं, जिनमें से लगभग एक करोड़ उपभोक्ता अटल गृह ज्योति योजना के तहत 100 रुपये में बिजली प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में कंपनियों का 10.19% बढ़ोतरी प्रस्ताव और सरकार के दावे एक-दूसरे के विपरीत नजर आ रहे हैं।


अब फैसला किसके हाथ में?

अंतिम निर्णय मध्य प्रदेश विद्युत नियामक आयोग को लेना है। जनसुनवाई में उपभोक्ता, विशेषज्ञ और संगठन अपनी राय रख रहे हैं।

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