बैतूल विधानसभा की 71 साल की समीक्षा
Assembly Review: बैतूल। जिला मुख्यालय की सबसे चर्चित सीट के रूप में बैतूल विधानसभा मानी जाती है। इस सीट पर कई दिग्गज नेताओं ने समय-समय पर कई रिकार्ड कायम किए हैं। कुछ रिकार्ड आज तक बरकरार है। इस संबंध में सांध्य दैनिक बैतूलवाणी ने अपने यू ट्यूब चैनल के रू-ब-रू कार्यक्रम में राजनैतिक समीक्षक एवं बैतूलवाणी के संपादक नवनीत गर्ग से कार्यक्रम के संजय शुक्ला ने विस्तृत चर्चा की।
प्रस्तुत है की गई चर्चा के मुख्य अंश:-
संजय शुक्ला- आप राजनैतिक समीक्षक है और आपकी राजनीति पर गहन नजर रहती है। पिछले इंटरव्यू में आपने बैतूल लोकसभा सीट पर 71 वर्षों का विश्लेषण किया था। आज हम आपसे बैतूल जिला मुख्यालय की उस सीट पर चर्चा करना चाहेंगे जिस पर पूर्व में कई दिग्गज नेता, मंत्री, प्रमुख दलों के प्रदेश अध्यक्ष एवं प्रदेश कोषाध्यक्ष निर्वाचित हो चुके हैं।
संजय शुक्ला- बैतूल सीट पर शुरू में कांग्रेस उम्मीदवार लगातार जीते पर बाद में यह सीट गैर कांग्रेसी उम्मीदवारों के कब्जे में आती गई क्यों?
नवनीत गर्ग- देश आजाद होने के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस का बोलबाला रहा है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव कांग्रेस जीतती रही। बैतूल सीट की बात करें तो 1952, 1957 और 1962 में कांग्रेस जीती फिर मिश्रित परिणाम आते गए। और 1998 के बाद तो हुए पांच चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ एक बार जीत मिली। इसका कारण मैं प्रदेश में कांग्रेस में क्षत्रपों का राज, जिले में कांग्रेस में बढ़ती गुटबाजी एवं छिंदवाड़ा के सांसद रहे कमलनाथ का 1980 के बाद जिले की कांग्रेस की टिकटों में बेजा हस्तक्षेप मानता हूं।
संजय शुक्ला- बैतूल सीट के बारे में मिथक बन गया है कि 1962 के बाद से इन 64 वर्षों में इस सीट पर लगातार दोबारा कोई नेता चुनाव नहीं जीत पाया है यह कहां तक सच है?
नवनीत गर्ग- काफी हद तक सच है। 1952, 1957 और 1962 में दीपचंद गोठी कांग्रेस की टिकट पर लगातार जीते। इसके बाद 1977 में माधव गोपाल नासेरी निर्दलीय और 1980 में भाजपा की टिकट पर चुनाव जीते। लेकिन नासेरी भी एक दल से लगातार नहीं जीते। इसके पहले और इसके बाद यह मिथक आज तक कायम है।
1962 में स्व. जीडी खण्डेलवाल जनसंघ की टिकट पर चुनाव हारे तो 1967 में जीत गए। 1972 में कांग्रेस के मारोतीराव पांसे से चुनाव हार गए। 1977 में निर्दलीय माधव गोपाल नासेरी ने मारोतीराव पांसे को हराया। 1980 में भाजपा के माधव गोपाल नासेरी ने फिर मारोतीराव पांसे को हराया। लेकिन 1985 में कांग्रेस के अशोक साबले चुनाव मैदान में आए और जीते तो 1990 में भाजपा के भगवत पटेल ने साबले को हराकर जीत दर्ज की। 1993 में फिर साबले चुनाव जीत गए। लेकिन 1998 में डॉक्टर साबले को टिकट नहीं मिली और कांग्रेस के विनोद डागा चुनाव जीते। 2003 में भाजपा के शिवप्रसाद राठौर और 2008 में अलकेश आर्य ने विनोद डागा को हराकर चुनाव जीता। 2013 में नए उम्मीदवार के रूप में हेमंत खण्डेलवाल मैदान में उतरे और कांग्रेस के हेमंत वागद्रे को हराकर विधायक बने। लेकिन 2018 में कांग्रेस के नए उम्मीदवार निलय डागा चुनाव जीते। और 2023 में हेमंत खण्डेलवाल भाजपा की टिकट पर सफल हो गए। इस तरह से 1962 के बाद एक दल के उम्मीदवार को लगातार चुनाव जीतने का मौका नहीं मिला। 2028 में क्या परिणाम होंगे यह जल्दबाजी होगी। लेकिन जिस तरह से देश और प्रदेश की राजनीति में भाजपा मजबूत और कांग्रेस कमजोर होती जा रही है उससे लगता है कि 2028 में इस सीट का मिथक टूट सकता है।
संजय शुक्ला- बैतूल सीट से सर्वाधिक और लगातार जीतने का रिकार्ड किसके नाम दर्ज है?
नवनीत गर्ग- 71 वर्षों में इस बैतूल सीट से लगातार और सर्वाधिक बार जीतने का रिकार्ड कांग्रेस के दीपचंद गोठी के नाम आज तक दर्ज है। वे बैतूल सीट के पहले चुनाव में 1952, 1957 और 1962 में दीपचंद गोठी कांग्रेस की टिकट पर लगातार जीते।
संजय शुक्ला- इस सीट से जीतकर कौन-कौन मंत्री बने?
नवनीत गर्ग- इस सीट से 8 बार कांग्रेस और 8 बार गैर कांगे्रसी जिनमें निर्दलीय, जनसंघ और भाजपा शामिल है। वे चुनाव जीते हैं। इस सीट से पहली बार 1967 में जनसंघ की टिकट पर जीते जीडी खण्डेलवाल संविद सरकार में मंत्री बने थे, तब गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री थे। इसके बाद कांग्रेस के डॉ. अशोक साबले दो बार मंत्री बने जिसमें एक बार उपमंत्री और एक बार केबीनेट मंत्री शामिल है। इसके बाद इस सीट पर यह सौभाग्य किसी को नहीं मिला। 2003 से 2023 के बीच भाजपा के 4 विधायक बने और सरकार भी भाजपा की बनी लेकिन कोई मंत्री नहीं बन पाया। यह बात अलग है कि हाल ही में बैतूल सीट के विधायक हेमंत खण्डेलवाल को सत्तारूढ़ भाजपा के प्रदेश संगठन का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है जो राजनैतिक समीकरणों में मुख्यमंत्री के बाद दूसरा शक्तिशाली पद माना जाता है।
संजय शुक्ला- क्या बैतूल सीट से यह भी मिथक बना हुआ है कि जो इस सीट से जीतता है प्रदेश में उसी की सरकार बनती है?
नवनीत गर्ग- हां, इस सीट पर आजादी के बाद हुए 16 चुनावों में से 15 बार ऐसा ही हुआ है कि जिस दल का बैतूल विधायक बना है उसी दल की प्रदेश में सरकार बनी है। 1952 से 1977 तक एवं 1985 से 2023 तक जिस दल का विधायक बना है उसी की सरकार बनी है। 1980 एक अपवाद है जहां विधायक और सरकार का दल अलग-अलग था। 1952, 1957 और 1962 में कांग्रेस के दीपचंद गोठी कांग्रेस की टिकट पर जीते और सरकार भी कांग्रेस की बनी। 1967 में जनसंघ के जीडी खण्डेलवाल और सरकार गैर कांग्रेसी बनी। 1972 में कांग्रेस के डॉ. मारोती राव पांसे और सरकार कांग्रेस की। 1977 में जनता पार्टी के विद्रोही नासेरी जीते और सरकार भी जनता पार्टी की बनी। 1985 में कांग्रेस के अशोक साबले जीते और सरकार कांग्रेस की बनी। 1990 में भाजपा के भगवत पटेल जीते और सरकार भाजपा की बनी। 1993 में कांग्रेस के अशोक साबले और 1998 में कांग्रेस के विनोद डागा जीते और कांग्रेस की सरकार बनी। 2003, 2008 और 2013 में भाजपा के शिवप्रसाद राठौर, अलकेश आर्य और हेमंत खण्डेलवाल जीते और तीनों बार सरकार भाजपा की बनी। 2018 में कांग्रेस के निलय डागा जीते और सरकार कांग्रेस की बनी। 2023 में भाजपा के हेमंत खण्डेलवाल जीते और भाजपा की सरकार बनी। अब 2028 में मैं राजनैतिक समीक्षक के रूप में यह परिदृश्य देख रहा हूं कि यह सीट फिर से भाजपा के पास रह सकती है और सरकार भाजपा की बन सकती है।
संजय शुक्ला- बैतूल सीट से पार्टी टिकट पर लड़ने और जीतने के बाद भी ऐसे कोई नेता है जिन्हें पार्टी ने दोबारा मौका नहीं दिया?
नवनीत गर्ग- हाँ, 1980 में भाजपा की टिकट पर माधव गोपाल नासेरी जीते लेकिन फिर कभी टिकट नहीं दी। 1993 में कांग्रेस की टिकट पर जीतने वाले डॉ. अशोक साबले को फिर आगे टिकट नहीं दी गई। 2003 में भाजपा से शिवप्रसाद और 2008 में अलकेश आर्य जीते लेकिन इन्हें भी जीतने के बाद अवसर नहीं मिला। इस तरह से यह कुछ उदाहरण है जो जीतने के बाद भी भूतपूर्व हो गए।
संजय शुक्ला- बैतूल और हरदा सीट का क्या कनेक्शन देखते हैं?
नवनीत गर्ग- हरदा सीट से भाजपा की टिकट पर 4 बार कमल पटेल जीते। लेकिन 2013 और 2023 में हार गए। इसी दौरान बैतूल से भाजपा की टिकट पर हेमंत खण्डेलवाल 2013 और 2023 में चुनाव जीते। इस तरह से जब-जब हरदा के कमल पटेल चुनाव हारे बैतूल सीट से हेमंत खण्डेलवाल चुनाव जीते हैं। एक बार जब 2018 में हेमंत खण्डेलवाल चुनाव हारे तब कमल पटेल हरदा से चुनाव जीत गए। इस तरह से हेमंत खण्डेलवाल और कमल पटेल एक साथ विधानसभा में नहीं पहुंचे। बैतूल लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले इस बैतूल और हरदा जिले के यह पिछले लंबे समय से भाजपा के दिग्गज नेता माने जाते हैं।
संजय शुक्ला- जातीय समीकरणों में यह सीट कुंबी बाहुल्य मानी जाती है, इस संबंध में 61 साल का इतिहास बताएं?
नवनीत गर्ग- इस सीट से कुंबी समाज के पहले सफल उम्मीदवारों में डॉ. मारोतीराव पांसे का नाम आता है जो 1972 में तो जीते लेकिन 1977 और 1980 में हार गए। इसके बाद डॉ. अशोक साबले ऐसे उम्मीदवार रहे जो 1985 और 1993 में कांग्रेस की टिकट पर जीते लेकिन 1990 में कांग्रेस एवं 2003 में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी से चुनाव हार गए थे। 1985 में भाजपा से लड़े पंजाबराव महस्की चुनाव हारे तो 2013 में कांग्रेस के हेमंत वागद्रे चुनाव हार गए थे। इसके अलावा 2003 में शरद पंवार की कांग्रेस से श्यामराव बारस्कर लड़े, 2008 में बसपा से तिलक पटेल और 2018 में सपाक्स से लता महस्की लड़ी ये तीनों हारे। इस तरह से इस सीट से कुंबी उम्मीदवार तीन बार जीता और 9 बार हारे।
संजय शुक्ला- बैतूल सीट से दो परिवारों की तीन पीढ़ी का क्या वास्ता है?
नवनीत गर्ग- 1952 के पहले चुनाव में खण्डेलवाल परिवार के आरडी खण्डेलवाल चुनाव लड़े, फिर 1962, 1967 और 1972 में उनके छोटे भाई जीडी खण्डेलवाल चुनाव लड़े। फिर 1998, 2013 में जीडी खण्डेलवाल के पुत्र राजीव खण्डेलवाल चुनाव लड़ चुके हैं। इसके बाद 2013, 2018 और 2023 में आरडी खण्डेलवाल के पोते हेमंत खण्डेलवाल चुनाव लड़े। वहीं दूसरे परिवार के रूप में डागा परिवार है जिसकी भी तीन पीढ़ी भी इस सीट से चुनाव लड़ चुकी है। 1967 में हरकचंद डागा कांग्रेस से चुनाव लड़े फिर उनके पुत्र विनोद डागा 1998, 2003 एवं 2008 में इस सीट से चुनाव लड़े। वहीं 2018 एवं 2023 में हरकचंद डागा के पोते एवं विनोद डागा के पुत्र निलय डागा इस सीट से चुनाव लड़े। यह बात अलग है कि इसमें सफलता जीडी खण्डेलवाल, हेमंत खण्डेलवाल, विनोद डागा एवं निलय डागा को मिली।
संजय शुक्ला- बैतूल के किस विधायक ने दो सगे भाईयों को हराया था?
नवनीत गर्ग- मेरी जानकारी के अनुसार 1952 में कांग्रेस के दीपचंद गोठी ने आरडी खण्डेलवाल को चुनाव हराया था और फिर ऐसा संयोग बना कि 1962 के चुनाव में कांग्रेस के दीपचंद गोठी ने जनसंघ के जीडी खण्डेलवाल को चुनाव हराया। आरडी खण्डेलवाल और जीडी खण्डेलवाल दोनों सगे भाई थे।
संजय शुक्ला- बैतूल विधानसभा में किस नेता के नाम कई रिकार्ड दर्ज है?
नवनीत गर्ग- बैतूल विधानसभा के 71 साल के इतिहास में वर्तमान विधायक हेमंत खण्डेलवाल के नाम कई रिकार्ड दर्ज है। जिनमें पहला श्री खण्डेलवाल जिले के ही एकमात्र ऐसे विधायक हैं जो विधायक के साथ-साथ सांसद भी चुने गए थे। इस विधानसभा सीट से भाजपा के वे अकेेले विधायक हैं जो दो बार निर्वाचित हुए हैं। वहीं बैतूल विधानसभा सीट से सर्वाधिक मतों की जीत भी श्री खण्डेलवाल के नाम है। 2013 के चुनाव में उन्होंने इस सीट पर 24 हजार 400 मतों से विजय हासिल करी थी जो इस सीट पर जीत का सबसे बड़ा आंकड़ा है। इसके अलावा श्री खण्डेलवाल के नाम 1 जुलाई 2025 को एक नया रिकार्ड दर्ज हुआ है। वे इसी दिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए गए हैं। किसी राष्ट्रीय दल के प्रदेश इकाई वो भी सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को उस प्रदेश के मुख्यमंत्री के बाद राजनैतिक दृष्टि से दूसरे नंबर का पद माना जाता है। बैतूल जिले के इतिहास में अभी तक यह उपलब्धि किसी अन्य नेता के नाम दर्ज नहीं हैं।
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