Wednesday , 15 April 2026
Home Uncategorized Holi: काशी की होली: आस्था, तंत्र और परंपरा का अनोखा संगम
Uncategorized

Holi: काशी की होली: आस्था, तंत्र और परंपरा का अनोखा संगम

काशी की होली: आस्था, तंत्र और

मां चौसठ्ठी देवी को पहला गुलाल चढ़े बिना अधूरी मानी जाती है शिवनगरी की होली

Holi: वाराणसी। काशी में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था और तांत्रिक परंपराओं का जीवंत उत्सव है। यहां होली की शुरुआत किसी घर-आंगन से नहीं, बल्कि तंत्र की देवी मानी जाने वाली मां चौसठ्ठी देवी के दरबार से होती है।

रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ से अनुमति लेने के बाद काशीवासी सबसे पहले मां के चरणों में गुलाल अर्पित करते हैं। मान्यता है कि जब तक चौसठ्ठी देवी को पहला रंग न चढ़े, तब तक काशी की होली अधूरी रहती है। करीब 500 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।


दशाश्वमेध घाट के पास चौसठ्ठी योगिनी मंदिर

दशाश्वमेध घाट के पास स्थित चौसठ्ठी योगिनी मंदिर होली की शाम अबीर-गुलाल के रंगों से सराबोर हो उठता है। पुराने समय में शहर और आसपास के गांवों से श्रद्धालु पैदल यात्रा कर यहां पहुंचते थे और गाजे-बाजे के साथ मां को गुलाल चढ़ाते थे। समय के साथ चौसठ्ठी यात्रा का स्वरूप भले छोटा हो गया हो, लेकिन मां को पहला गुलाल अर्पित करने की परंपरा आज भी अक्षुण्ण है।


64 योगिनियों का स्वरूप मानी जाती हैं मां

धार्मिक मान्यता के अनुसार चौसठ्ठी देवी 64 योगिनियों का स्वरूप हैं। स्कंद पुराण के काशीखंड में उल्लेख है कि इनके दर्शन और पूजा से पाप नष्ट होते हैं तथा नवरात्र में आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

ज्योतिषाचार्य पं. रत्नेश त्रिपाठी के अनुसार, प्राचीन काल में काशी के राजा दिवोदास शिव पूजा के पक्ष में नहीं थे। देवताओं के आग्रह पर भगवान शिव कैलाश चले गए। बाद में बाबा विश्वनाथ ने 64 योगिनियों को काशी भेजा। योगिनियों को यह नगरी इतनी प्रिय लगी कि वे यहीं बस गईं और आज चौसठ्ठी देवी के रूप में पूजी जाती हैं।


मंदिर का ऐतिहासिक महत्व

मंदिर परिसर में महिषासुर मर्दिनी, चौसठ्ठी माता और मां भद्रकाली की प्रतिमाएं स्थापित हैं। माना जाता है कि यहां दर्शन करने से इच्छाएं पूरी होती हैं और पापों से मुक्ति मिलती है। चौसठ्ठी घाट का निर्माण 16वीं शताब्दी में बंगाल के राजा प्रतापादित्य ने कराया था। बाद में 18वीं शताब्दी में बंगाल के ही राजा दिग्पतिया ने इसका पुनर्निर्माण कराया। नवरात्र और होली के अवसर पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा क्षेत्र भक्ति व रंगों के उत्साह से सराबोर हो जाता है।

साभार…

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Campaign: एचपीवी वैक्सीन में बैतूल 13 वें नंबर पर

राजगढ़ में 100 प्रतिशत, प्रदेश में आया अव्वल Campaign: बैतूल। सर्वाइकल कैंसर...

Helpline Issued: महंगी किताबों पर स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए हेल्पलाइन जारी

नए शिक्षा सत्र में अभिभावकों को राहत, शिकायत पर तुरंत होगी कार्रवाई...

Arrested: पानी की मोटर चोरी करने वाले दो आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने चोरों से 1.20 लाख का मशरूका किया बरामद Arrested: आमला।...

Arrested: पानी की मोटर चोरी करने वाले दो आरोपी गिरफ्तार

पुलिस ने चोरों से 1.20 लाख का मशरूका किया बरामद Arrested: आमला।...