Success: भोपाल। चिकित्सा विज्ञान में नया अध्याय जोड़ते हुए एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने नवजात शिशुओं की गर्भनाल (प्लेसेंटा) से तैयार एमनियोटिक मेम्ब्रेन (Amniotic Membrane) के जरिए 13 मरीजों की आंखों की रोशनी लौटा दी है। यह झिल्ली डिलीवरी के बाद आमतौर पर वेस्ट मानी जाती थी, लेकिन अब इसे आंखों की गंभीर चोट और संक्रमण के उपचार में ‘जीवित पट्टी’ (Biological Bandage) के रूप में उपयोग किया जा रहा है।
डॉक्टरों के मुताबिक, एमनियोटिक मेम्ब्रेन आंख की पारदर्शिता बनाए रखने, घाव भरने और संक्रमण रोकने में बेहद असरदार है। खास बात यह है कि जहां निजी अस्पतालों में यह सर्जरी ₹40,000 से ₹70,000 तक में होती है, वहीं एम्स भोपाल में यह इलाज आयुष्मान योजना के तहत पूरी तरह मुफ्त है। गैर-आयुष्मान मरीजों के लिए इसका खर्च सिर्फ ₹250 रखा गया है।
🧒 कार्बाइड गन से घायल बच्चे का भी इलाज
एम्स के नेत्र विभाग के अनुसार, जिन मरीजों का इलाज एमनियोटिक मेम्ब्रेन से किया गया, वे सभी कार्बाइड गन से घायल हुए थे। 29 अक्टूबर को नर्मदापुरम निवासी 11 वर्षीय राजा को भी इसी चोट के बाद भर्ती किया गया था। उसकी आंख में गंभीर चोट थी, जिसके बाद डॉक्टरों ने एमनियोटिक मेम्ब्रेन लगाया। 15 दिन के भीतर उसका 80% विजन वापस लौट आया।
🔬 क्या है एमनियोटिक मेम्ब्रेन?
नेत्र विशेषज्ञ डॉ. अदिति दुबे (गांधी मेडिकल कॉलेज) के अनुसार, एमनियोटिक मेम्ब्रेन प्लेसेंटा की अंदरूनी झिल्ली होती है, जो अत्यंत पतली, पारदर्शी और लचीली होती है। इसमें ग्रोथ फैक्टर, एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रोटीन और हीलिंग एजेंट्स प्राकृतिक रूप से मौजूद रहते हैं।
प्रसव के बाद इसे सुरक्षित रखकर स्टेराइल तकनीक से संरक्षित किया जाता है। जरूरत पड़ने पर यह झिल्ली आंख की सतह पर लगाई जाती है, जिससे क्षतिग्रस्त कॉर्निया या कंजक्टाइवा तेजी से ठीक हो जाते हैं।
🧫 स्टेम सेल से भी हो रहा इलाज
डॉक्टरों का कहना है कि जिन मरीजों की आंखों को अधिक नुकसान पहुंचा है या वे देर से इलाज के लिए आते हैं, उनके लिए स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (SLET तकनीक) का उपयोग किया जा रहा है। इसमें स्वस्थ आंख से स्टेम सेल लेकर घायल आंख में लगाए जाते हैं, जिससे कॉर्निया ट्रांसप्लांट की जरूरत नहीं पड़ती।
📈 प्रदेशभर में 150 से अधिक मरीजों की सुधर रही रोशनी
प्रदेश में अब तक 300 से अधिक लोग कार्बाइड गन से घायल हो चुके हैं। अकेले भोपाल में 70 मरीजों की आंखों में एमनियोटिक मेम्ब्रेन लगाया गया। इन सभी की आंखें बुरी तरह क्षतिग्रस्त थीं, लेकिन धीरे-धीरे उनकी रोशनी लौट रही है।
🚫 कार्बाइड गन पर प्रतिबंध के बावजूद हादसे जारी
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश के बाद राज्य में कार्बाइड गन की बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है। इसके बावजूद इनसे घायल होने के मामले अब भी सामने आ रहे हैं, जो प्रशासनिक स्तर पर चिंताजनक हैं।
एम्स भोपाल की यह पहल न केवल चिकित्सा नवाचार का उदाहरण है, बल्कि समाज में चिकित्सा अपशिष्ट के पुनः उपयोग की दिशा में भी नई राह दिखा रही है।
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