Festival: चिचोली (बैतूल)। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले की चिचोली तहसील अंतर्गत छोटा सा गांव मलाजपुर एक बार फिर देश-दुनिया की नजरों में है। यहां मेला आगामी 3 जनवरी से 23 जनवरी तक चलेगा। जनपद पंचायत चिचोली के तत्वावधान में आयोजित यह मेला आस्था, रहस्य और परंपरा का अद्भुत संगम माना जाता है।
गुरुसाहब की समाधि और प्रेत बाधा से मुक्ति की मान्यता
मान्यता है कि मलाजपुर में स्थित संत श्री गुरुसाहब बाबाजी की पवित्र समाधि के दर्शन मात्र से गंभीर से गंभीर प्रेत बाधाएं दूर हो जाती हैं। करीब चार सौ वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को देखने और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
चमत्कारों की भूमि: गुड़ पर मक्खी, शक्कर पर चींटी नहीं
मलाजपुर का यह दरबार अपने रहस्यमयी चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है। श्रद्धालु यहां गुड़ और शक्कर का चढ़ावा तथा तुलादान करते हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से पूरे मंदिर परिसर में मक्खी या चींटी दिखाई नहीं देती। इसे गुरुसाहब का चमत्कार माना जाता है। मान्यता यह भी है कि सांप के विषदंश से पीड़ित लोग यहां के चरणामृत और झाड़-फूंक से स्वस्थ होकर लौटते हैं।
कैसे होती है ‘भूतों’ से मुक्ति?
मेले के पहले दिन, पूर्णिमा पर यहां ‘भूतों का बाजार’ लगता है।
- स्नान: पीड़ित व्यक्ति पहले मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर दूर बंधाराघाट पर स्नान करता है। मान्यता है कि स्नान के दौरान प्रेतात्मा सक्रिय हो जाती है।
- परिक्रमा: इसके बाद पीड़ित को गुरुसाहब की समाधि पर लाया जाता है, जहां चीख-पुकार और असामान्य हरकतों के बीच समाधि की परिक्रमा कराई जाती है।
- मुक्ति: अंत में समाधि के समक्ष झाड़-फूंक और कसम दिलाने की प्रक्रिया के बाद प्रेतात्मा को शरीर से विदा किया जाता है।
इतिहास: बालक देवजी से बने ‘गुरुओं के साहब’
इतिहास के अनुसार विक्रम संवत 1700 में उदयपुर से आए एक बंजारा परिवार में जन्मे देवजी संत बचपन से ही चमत्कारिक लीलाओं के लिए प्रसिद्ध थे। कहा जाता है कि वे मिट्टी से गुड़ और रेत से शक्कर बना देते थे।
उनके गुरु जैता बाबा, जो दृष्टिहीन थे, ने उनकी परीक्षा ली। देवजी ने न केवल चिड़ियों द्वारा चुगी गई फसल को चमत्कारिक रूप से खलिहान में भर दिया, बल्कि अपने गुरु की आंखों की रोशनी भी लौटा दी। इससे प्रसन्न होकर जैता बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया— “तुम गुरुओं के भी साहब रहोगे”—और तभी से वे ‘गुरुसाहब बाबा’ कहलाए। उन्होंने सन् 1770 में जीवित समाधि ली थी।
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